Thursday, December 04, 2008

10/10/2008

माँ से बड़ा कलेजा किसी का नही हो सकता है, जो अपने बच्चे को पहले अपने गर्भ मे नौ माह अपने खुन से सिचती है फिर रात को रात नही दिन को दिन नही समझती है उसकी जिंगदी अपने बच्चे से शुरु होकर वही आसपास रह जाती है. एक बच्चा चाहे जितना बड़ा हो जाए पर माँ को नही समझाने लायक नही होता। क्योकि आप जिसे समझाना चाहते हैं आप वही से आये हैं आपने चलना वहीं से सीखा आपने बोलना वही से सीखा है, शायद ही कोइ हो जो अपने माँ को तकलीफ दे.

एक लड़की जो अपने उसी माँ को छोड़ के आपके साथ हो जाती है, जिसकी सुबह साम आप हैं जो आप से शुरु होती है आप मे रह जाती है. जिसकी आशा निराशा आप हैं. आप ही रोशनी हैं

जब इन दोनो के बिच में आप आ जायें तो क्या करना है क्या कोई बता सकता है क्या करना है क्या कोई बता सकता है शायद उपर वाले पे छोड़ देना ज्यादा सही कदम होगा पर नही हर समस्या का समाधान है तो इसका भी होगा सोचते है रास्ता मिल जायेगी फिर मंजील भी दिखेगी. कोशीश करना आपका काम है जो दिल से होना चाहिय जो करना है आपको .
09/10/2008
किसी ने ठीक ही कहा है. आप सिर्फ चल सकते हैं, बस आपने चलना है तय कोई और कर रहा होता है किस तरफ चलना है आपको, यह बात लड़कियो के मामले मे ज्यादा सटिक और कड़ी हो जाती है. तय करने वाले को लगता है मैं ये इसके अच्छे के लिए कर रहा हुं जो वो करता भी है, पर बिना जाने बिना सोचे चाहे वह मोबाइल मे बात नही करने देना हो या ठीक से चलो या ये मत पहनो . ठीक है मन मार के उन्हे करना भी परता है यह सब पर क्या हर जगह हर मोड़ पे इसी तरह चलना होगा. क्यों ? सिर्फ लड़की होने के कारण इतना कुछ, मैं नही जानता कल क्या होगा पर इतना पता है. जो होगा वह अच्छा ही होगा. हम हवा कि दिशा तो नही बदल सकते हैं पर नाव के पाल को सही कर सही दिशा मे चल सकते हैं, यह तो हमारे हाथ मे है.
कुछ बातें, बहुत लोगो को पसंद आती है पर जरुरी नही की सभी को पसंद आ जाए.
आप अगर सही हैं, तो बिलकुल बिना सोचे सच कहे, सामने वाले को हो सकता है बुरा लग जाये, पर याद रहे सच सही है, नही कहने से अच्छा है सच कहे. झुट बोलने से अच्छा है न बोले....

जीवन जीने का नाम है

जीवन जीने का नाम है सो इसे पुरा जीना चाहिये. खुशी या गम दोनो जरुरी है, तो दोनो के लिए तैयार रहिये.
कब क्या होगा या होना है यह आपके हाथ मे नही है, पर जो है उसे करने मे देरी नही करना कभी, क्या पता वो तुम्हारी जिन्दगी की मंजिल तय कर दे.
अगर सिर्फ चीनी का स्वाद मिलते रहे तो आप भुल जाते है कि चीनी कि मिठास क्या है, इक तिखी मिर्ची के बाद जरा सी चीनी से पता चलता है की मिठास किसे कहते हैं.
सो जब भी खुशी दिखे उस पल के कतरे कतरे को जिये, जब गम दिखे उसे आने दे क्योंकि वो आयगी फिर चली जायगी, तो यह गम के बाद खुशी और अच्छा लगने लगेगा उस खुशी की तैयारी करें, गम को जाने दें.
हर शाम की सुबह होती है, क्यों..... है न.........
.KR.

Sunday, September 28, 2008

प्यार है या सजा

प्यार है या सजा ऐ मेरे दिल बता टुटता क्यों नही दर्द का सिलसिला,
या रब्बा दे दे कोइ जान भी अगर, दिलबर पे हो न कोइ असर.

क्या गाना है साहब , दिल को छु गया जरुर सुनिये फुरसत में.

Thursday, February 02, 2006

Sinus ! एक बहुत बड़ी समस्या है समाधान है साइनस का

एक तो बहुत दिनों के बाद कुछ लिख रहा हूं और उसपे भी समस्या का जिक्र क्योंकि यही है वो प्रमुख समस्या जिसके कारन मैं इंटरनेट क्या लगभग हर एक चीज से ज़ुदा था। एक तो मेरी नाक के अंदर की मांस बढ़ी हुई है और धुल से एलर्जी है उसपे जबरदस्त ठंड थी तीनो ने मिलके लगभग मेरी सांस ही बंद कर दी थी।
बहुत सारे डाक्टरों को दिखाया गुलाबबाग, पूर्णियां, से शुरु करके गंगाराम दिल्ली, हो या एम्स दिल्ली, हो सब जगह दिखाया सभी ने या तो ऑपरेशन करने की सलाह दी पर कहा कि फिर हो सकता है अंत में हारकर घर वापस आ गया क्योंकि ऑपरेशन करवाने के पझ में मैं नही था गंगाराम में जो दवा दी गई उससे थोड़ी राहत तो हुइ पर फिर गुलाबबाग में वही स्थति थी।
फिर मेरी मुलाकात एक और साइनस के रोगी से गुलाबबाग में ही हो गइ उसने मुझे एक ड्रॉप का नाम दिया यह तो मेरे लिए राम वाण हो गया भैया क्या बताउं जहां भी दिक्कत आती है  तुरत डाल लेता हूं और तुरत आराम मिलता है। हां ड्रॉप डालने से पहले मैंने डाक्टर से सलाह जरुर ले लिया ताकी किसी प्रकार की और परेशानी में न आ जाउं । ड्राप का नाम है Otrivin ( Xylometazoline Hydrochloride Nasal Drops IP ) जब भी नाक बंद हो ले लेता हूं 5 - 10 मिनट में आराम मिल जाती है । कोई भी भाई लेने से पहले डाक्टर की सलाह जरुर ले।
वैसे अगर आपके पास किसी प्रकार की सलाह हो तो जरुर दे ताकी मांस जो बढ़ गई है कम हो जाए तो मैं एक आम जिन्दगी जी सकूं।

Monday, November 28, 2005

स्वामी विवेकानंद जी कुछ बातें

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सब से प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।

मैं इस मंच पर से बोलनेवाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया हैं कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया हैं। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था । ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने महान् जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा हैं। भाईयो, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ, जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:


रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् । नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ।।


- ' जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।'

यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक हैं, स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत् के प्रति उसकी घोषणा हैं:

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।।




- ' जो कोई मेरी ओर आता हैं - चाहे किसी प्रकार से हो - मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।'

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी बीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये बीभत्स दानवी न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता । पर अब उनका समय आ गया हैं, और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टाध्वनि हुई हैं, वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का, तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होनेवाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्युनिनाद सिद्ध हो।




मैं आप लोगों को एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ। अभी जिन वाग्मी वक्तामहोदय ने व्याख्यान समाप्त किया हैं, उनके इस वचन को आप ने सुना हैं कि ' आओ, हम लोग एक दूसरे को बुरा कहना बंद कर दें', और उन्हे इस बात का बड़ा खेद हैं कि लोगों में सदा इतना मतभेद क्यों रहता हैं ।

परन्तु मैं समझता हूँ कि जो कहानी मैं सुनाने वाला हूँ, उससे आप लोगों को इस मतभेद का कारण स्पष्ट हो जाएगा । एक कुएँ में बहुत समय से एक मेढ़क रहता था । वह वहीं पैदा हुआ था और वहीं उसका पालन-पोषण हुआ, पर फिर भी वह मेढ़क छोटा ही था । धीरे- धीरे यह मेढ़क उसी कुएँ में रहते रहते मोटा और चिकना हो गया । अब एक दिन एक दूसरा मेढ़क, जो समुद्र में रहता था, वहाँ आया और कुएँ में गिर पड़ा ।

"तुम कहाँ से आये हो?"

"मैं समुद्र से आया हूँ।" "समुद्र! भला कितना बड़ा हैं वह? क्या वह भी इतना ही बड़ा हैं, जितना मेरा यह कुआँ?" और यह कहते हुए उसने कुएँ में एक किनारे से दूसरे किनारे तक छलाँग मारी। समुद्र वाले मेढ़क ने कहा, "मेरे मित्र! भला, सुमद्र की तुलना इस छोटे से कुएँ से किस प्रकार कर सकते हो?" तब उस कुएँ वाले मेढ़क ने दूसरी छलाँग मारी और पूछा, "तो क्या तुम्हारा समुद्र इतना बड़ा हैं?" समुद्र वाले मेढ़क ने कहा, "तुम कैसी बेवकूफी की बात कर रहे हो! क्या समुद्र की तुलना तुम्हारे कुएँ से हो सकती हैं?" अब तो कुएँवाले मेढ़क ने कहा, "जा, जा! मेरे कुएँ से बढ़कर और कुछ हो ही नहीं सकता। संसार में इससे बड़ा और कुछ नहीं हैं! झूठा कहीं का? अरे, इसे बाहर निकाल दो।"

यही कठिनाई सदैव रही हैं।

मैं हिन्दू हूँ। मैं अपने क्षुद्र कुएँ में बैठा यही समझता हूँ कि मेरा कुआँ ही संपूर्ण संसार हैं। ईसाई भी अपने क्षुद्र कुएँ में बैठे हुए यही समझता हूँ कि सारा संसार उसी के कुएँ में हैं। और मुसलमान भी अपने क्षुद्र कुएँ में बैठा हुए उसी को सारा ब्रह्माण्डमानता हैं। मैं आप अमेरिकावालों को धन्य कहता हूँ, क्योकि आप हम लोगों के इनछोटे छोटे संसारों की क्षुद्र सीमाओं को तोड़ने का महान् प्रयत्न कर रहे हैं, और मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में परमात्मा आपके इस उद्योग में सहायता देकर आपका मनोरथ पूर्ण करेंगे ।

अंग्रेजी शासन काल में जब भारत देश अपना आत्मविश्वास खो दिया था तब भारत का धर्म के आकाश पर एक उज्ज्वल जोतिष्क के तरह स्वामी विवेकानंद के आगमन हुआ। उन्होने अमरिकास्थित शिकागो शहर में सन 1893 में घटित विश्व धर्म महासम्मेलन में सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व की। भारत का वेदान्त अमरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानंद के वक्तृता के कारण ही पहुचा। अपने मत से पूरे विश्व को हिलवाने के शक्ति उनमें था। वापस भारत लौटने के पश्चात उन्होने रामकृष्ण मिशन का स्थापना किया, जो आज भी अपना काम कर रहा है। स्वामिजी ने रामकृष्ण परमहंस जी के सुयोग्य शिष्य थे। रामकृष्ण जी बचपन से ही एक पहुचे हुए सिद्ध पुरुष थे।
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भारत को धर्म के दिशा पर एक विश्वृगुरु उनके कारण ही बन सकता था। पर उनको 39 का कम आयु में ही धराधाम से विदाई लेना पड़ा था। आखिर क्यों ? बचपन से ही स्वामी विवेकानंद ने तम्बाकु सेवन शुरु किया था। उनके घर में हर एक जातियों के लिए अलग अलग हुका (तम्बाकु सेवन का यंत्र) रखा रहता था। बालक नरेंद्र ने उन सब को चख कर यह देखना चाहता था कि उसका जाति भ्रष्ट होता या नहीं। यह परीक्षा नरेंद्र ने अलग अलग जातियों के नाम पर रखा हुआ पानी के गिलास के साथ भी कर सकता था। परंतु तम्बाकु के साथ यह परीक्षा करने के बिषमय फल स्वामिजी को जिन्दगी भर के लिए एक तम्बाकु खोर बन कर भुगतना पड़ा। आखिर स्वामिजी के 39 बरस के उम्र में अकालमृत्यु के मुख्य कारण तम्बाकु से पयदा होने वाला रोगों ही था। यह कितना हौरान होने वाला बात है कि ब्रह्म का ज्ञान भी उनको तम्बाकु से बचा नहीं पाया। इस लिए अब सब से पहले जरूरत है एक शराब और तम्बाकु के नशा से मुक्त भारत व विश्व का निर्माण। नशा मुक्ति के स्थान पतंजली का अष्टांग योग का यम-नियम के भी पहले रखना चाहिये।

विकिपीडिया से लिया गया है।

Wednesday, November 23, 2005

प्रचीन भारतीय माप तौल प्रणाली

8 खसखस

1 चावल

8 चावल

1 रत्ती

6 रत्ती

1 आना

8 रत्ती

1 माशा

12 माशा / 6 आना

1 तोला

5 तोला

1 छटांक

16 छटांक

1 सेर

4 छटांक

1 पाव

4 पाव

1 सेर

5 सेर

1 पसेरी

8 पसेरी

1 मन

1 मन

822/7 पौंड

फरीद आलम, गोपालगंज (बिहार)   सो. अहा ज़िंदगी
 
आज भी आप अगर गाँव घर में जाऐंगे तो इस तरह के शब्दो से पाला पर ही जाएगा आपका कि,  हमरे शादी मे तो  20 तोला सोना मिला था,  या बहू आज 1 छटांक तेल सर में लगा देना,  या 2 सेर घी लेते आना । रत्ती भर भी अच्छा लगा हो तो बताना जरुर भईया, कोमेंट लिंक पास में ही है...

Monday, November 21, 2005

माँ के हाथो की रोटी

माँ, यह शब्द मात्र नही है। जिसकी व्याख्या शायद ही कोई पंडित कर सके या फिर एक ममता भरी पुकार ही काफी है। भगवान ने जब संसार बनाया होगा तो सोचा होगा मैं कैसे हर एक के पास जा कर उसकी मदद कर सकता हुं तो इन्होंने माँ बना दिया, जिसकी ममता के साये में बाद में स्वयं भगवान भी रहना चाहते हैं कभी राम के रुप मे, कभी श्याम के रुप में ।  मैं बहुत खुश नसीब हुं जिसे कम से कम माह मे तीन चार दिन तो माँ के हाथों की रोटी खाने को मिल जाती है, बहुत से लोग इसके लिए सिर्फ सोच के रह जाते हैं।
माह मे तीन चार दिन इसलिए क्योंकि जब पत्नी को मासीकधर्म होता है तो उसे रशोई से दूर रहना परता है जिसके कारण माँ ही खाना बनाती हैं फलस्वरूप मुझे माह मे तीन चार दिन माँ के हाथों की प्यारी और सोंधी खूशबु वाली रोटी खाने को मिल जाती हैं। मैंने बहुत जगह खाना खाया है मेरी पत्नी भी बहुत ही अच्छा खाना बनाती है पर माँ के हाथों की प्यार भरी रोटी जैसा स्वाद कहीं नही मिलता है।
शायद आपको याद हो जब बचपन में आपको कभी चोट लगी हो तो कैसे माँ का कलेजा कांप जाता था कैसे वह हर जतन करती थी कि आपका सारा दर्द जल्दी से जल्दी ठीक हो जाए। कैसे एक रोटी खिलाने के लिए आपके पीछे-पीछे भागती थी क्यो याद है न। पर बड़े दुख की बात है कुछ लोग अपनी माँ को वृद्ध आश्रम में छोड़ आते हैं। जिसने नो महीने अपने पेट मे पाल के अपने बच्चे को जन्म दिया, अपने खून से खींच के जिसे बड़ा किया। वही आज इन्हे वृद्ध होने के बाद किसी वृद्ध आश्रम में छोड़ आते हैं इतना कुछ होने के बाद भी अगर समय मिले तो ऐसे लाल से मैं कहुंगा एक बार सिर्फ झूठी खबर वृद्ध आश्रम में माँ तक पहुंचाना कि तुम बीमार हो फिर देखना कि आज भी तुम्हारे लिए माँ वैसी ही तरपेगी जैसे जब तुम उनके गोद मे रहते थे तो वह तरपती थी । पर पता नही तुम्हें क्या हो गया है पर याद रखो एक दिन तुम भी बूढ़े हो जाओगे फिर शायद तुम्हें पता चले कि कैसा दर्द होता है पर तब तक बहुत देर हो जाएगी। अभी समय है उठो और जाकर प्यार से माँ को घर लाओ।
 

Thursday, November 17, 2005

जापान सप्ताह मे सात दिन पढ़ाई

सबसे पहले मैं इनका परिचय आप लोगो से करवा दुं। ये पुर्णियां के रहने वाले है जो अभी जापान मे कार्यरत हैं, हिन्दी से प्रेम है पर हिन्दी टाईप नही कर पाते है हा कोशिश ज़रुर कर रहे हैं सो मैने इन्हे जीतूजी का बाहारा प्रेम का पता दिया और इंडिया आइएमई के बाबत बताई है कि किस तरह हिन्दी बड़ी आसानी से लिखा जाता है।
जापान के बारे मे जैसा कि इन्होंने बताया है यहां के बच्चों मे बचपन से ही कार्य करने की प्रेरणा दी जाती है। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां स्कूलों में रविवार को भी छुट्टी नही मिलती है यानी कि सात दिन का पढ़ाई। और जापानी लोग काम के प्रति दीवाना होते है साथ ही खूब पीते है, इस तरह दिन भर की थकावट रात को निकालते हैं।
प्रशांत भाई अभी कोई भी ब्लॉग नही लिख रहे है हां इनका एक प्रोफाइल है जिसके जरिए आप उनसे संपर्क कर सकते हैं।